निखार प्रिये!
पल्लू से जो उतरा पावन, वो अनमोल निखार प्रिये! जैसे घने बादलों में से, चमके बिजली यार प्रिये! नीले-नीले अंबर जैसा, यह गहरा सा रंग तुम्हारा, जैसे साफ़ निरभ्र गगन में, बहती है कोई उजियारा, श्वेत घोंसले में सोते दो- पक्षियों का संसार प्रिये! पल्लू से जो उतरा पावन, वो अनमोल निखार प्रिये! गले सजी जो काली माला, पहला पहरा देती है, सोते हुए परिन्दों की वो, लक्ष्मण रेखा लगती है, हाथों की मेंहदी कहती है- होने को लाचार प्रिये! पल्लू से जो उतरा पावन, वो अनमोल निखार प्रिये! घायल मन व्याकुल बैठा है, इश्क-हथकड़ी पहने को, अधखुली आँखें आतुर हैं, मौन समर्पण कहने को, झुकी पलक ये कर देती है- अभिसार स्वीकार प्रिये! पल्लू से जो उतरा पावन, वो अनमोल निखार प्रिये!