खिड़की, पानी, सन्नाटा और अनावश्यक दूरियाँ
सड़न पैदा करती है यह नमी दीवारों पर भी और इस बंद कमरे में भी। खिड़की के काँच पर रेंगती बूँदें कोई कविता नहीं हैं, वे महज़ पानी की लकीरें हैं जो गुरुत्वाकर्षण के नियम से नीचे गिर रही हैं। पर मैं ढूँढ रहा हूँ उसमें— तुम्हारी हँसी का व्याकरण। कितना मूर्खतापूर्ण है इस कड़कती बिजली में तुम्हारी आवाज़ सुनना, और हवा के झोंके के साथ एक ऐसे नाम को फेफड़ों में भर लेना जो इस वक़्त इस शहर के पिनकोड पर मौजूद ही नहीं। यह जो आँखों का गीलापन है, यह कोई 'विरह का उपहार' नहीं; यह सीधे-सीधे एक रासायनिक प्रतिक्रिया है उस खालीपन की, जो तुमने मेरे और इस खिड़की के बीच छोड़ दिया है। देह का न मिलना कोई उत्सव नहीं होता, वह एक अंतहीन, तीखी कसक है। पर इस सन्नाटे में, जहाँ तुम नहीं हो, और सिर्फ़ पानी गिर रहा है— मेरा इस तरह टूटकर बिखरना ही शायद मेरे होने की इकलौती साक्ष्य है।