जब....
जब पवन मंद-मंद मुस्काए झरनों से झर-झर संगीत बहे गगन में काले बादल छाएं रिमझिम बूंदों की रागिनी पर मयूर भी मस्त हो नाच दिखाएं तो... मैं प्रीत लिखूं। जब धरती सुनहरी धूप नहाए खेतों में फसलें लहलहाएं अंबर से शीतल चांद चांदनी बरसाए रात की नीरव खामोशी में मन उमंगों के दीप जलाए तो... मैं नवगीत लिखूं। जब नदियाँ कल-कल स्वर में बोलें सागर में उठती तरंगें हिलोरें लें धरा ओढ़कर हरी चुनरिया मुस्काए भोर की पहली किरण जब अंधकार को दूर भगाए तो... मैं नव चेतना लिखूं। जब शाम ढले सिंदूरी अंबर हो जाए पंछी अपने नीड़ को वापस आएं घरों में सनेह के दीपक टिमटिमाएं मां की लोरी की थाप पर जब कोई छोटा बच्चा सो जाए तो... मैं सुकून लिखूं। जब माटी की सोंधी महक जगाए बचपन की यादें लौट-लौट आएं सावन का झूला पेंग बढ़ाए पीपल की ठंडी छांव तले जब सब मिलकर ठहाके लगाएं तो... मैं मीत लिखूं। जब पतझड़ के बाद बहार मुस्काए सूखे तरुवर पर नए पात आएं कांटों के बीच भी गुलाब खिलखिलाए संघर्षों की तपती धूप के बाद जब चेहरे पर जीत की मुस्कान आए तो... मैं नव इतिहास लिखूं। जब यादों का सावन अंखियों में घिर आए राह तकते-तकते ये नैना थक जाएं ते...