प्रेम-मंजरी
मृगमद सी श्वासें तेरी, दृगन् मादकता छाय।
रतिकेलि के स्वप्न उपजे, छवि निरखत बल खाय।।1
अधर गुलाबी पांखुरी, मुसकन मोहक रूप।
तन कांचन सा दमकता, सदृश खिली हो धूप।।2
अधरों की मदिरा पिये, तन मन बेसुध होय।
बाहुपाश में बांध कर, पीड़ा विस्मरित होय।। 3
थरथर कांपे देह यहि, परस भयो जब मीत।
अंग-अग में ज्वाला जली, भूली दुनिया रीत।।4
कंचन कुंचन तानि आये, सुदृढ़ भये भुज पाश।
स्वेद-कणों से खिल उठी, तन की मधु मधु वास।।5
अधरन सो अधर मिले, बढ़ी हिये की रार।
डूबे रस के सिंधू में, मिट गई सब तकरार। ।6
सेज सजी कामनन की, दीपक भयो मलीन।
रतिक्रीडा में खो गये, प्रेमी दोऊं लीन।।7
मिटी प्यास सब जनम की, शांत भई अब देह।
जैसे पावन नीर में, घुलमिल गया सनेह।।8
बिखरी अलकें सेज पर, अधर हुए खामोश ।
मौन कह रहा प्रेम की, गाथा पाकर होश।।9
दो तन थे पर एक हुए, मिटा गयी सब द्वैत।
प्रेम शिखर पर हम मिले, हो गये अब अद्वैत ।।10
टिप्पणियाँ