मौन तब भंग होता है जब अन्याय अत्याचार शोषण और दमन उसके आगे वीभत्स रूप ले लेता है और कवि की प्रतिभा का अवरूद्ध ज्वालामुखी अनायास ही फट पड़ता है । ह्रदय छलनी छलनी होकर शब्दों को गढता है और नया संसार रचता है।
तुम क्यों अचानक
मिलन बांसुरी बजाकर सृजन का साज सजाकर नेह के नयन मिलाकर प्रीत के मधुर गीत गाकर खो गई तुम क्यों अचानक... छुपी चाह की अग्नि में घी छिड़क कर अंधेरी निशा में रोशनी दिखाकर कामज ज्वाला भडका कर रोम-र में दाह उकसाकर छोड़ गई तुम क्यों अचानक.... कौन - सी राह में गुजर गई हो कौन-सी स्पंदित शिराओं में सिमट गई हो जर्जर वय की उच्छखृंला में घिरकर दृगों में जग का सार लिए चली गई तुम क्यों अचानक .! ~जीवन समीर
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