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बिखंडित पुरुष का कोलाज

वह लौटता है थका-हारा नहीं, बल्कि किस्तों में मरा हुआ। दरवाजे पर दस्तक देते ही वह चेहरे पर टांग लेता है—'सब ठीक है' का एक पेशेवर मुखौटा, क्योंकि दुनिया को एक मुकम्मल रीढ़ की हड्डी चाहिए, मनुष्य नहीं। ​ वह जोड़ता है, समेटता है, सहेजता है स्त्री, बच्चे, बूढ़े मां-बाप और खोखले रिश्ते... वह घर की छत थामे खड़ा एक खंभा है, जिसकी दरारों को देखने की फुर्सत दीवारों को भी नहीं है। ​ मौन का चीरफाड़...  ​भीतर एक सन्नाटा है—खौलता हुआ, पर वह अपनी घुटन को 'कुंठा' के डिब्बे में बंद रखता है। गुस्सा, उदासी, और अपराधबोध का एक ऐसा कॉकटेल, जिसे वह हर रोज पीता है और मुस्कुराता है। क्योंकि 'पुरुष' का रोना, उसकी सामाजिक वल्दियत पर एक सवालिया निशान है। ​स्त्री साथ देती है, पर वह भी उस कगार तक नहीं पहुंच पाती जहाँ पुरुष का सामर्थ्य, बेबसी बनकर घुटने टेक देता है। यह सह-अस्तित्व है या दो समानांतर दुखों का मौन समझौता? ​ उम्र का कबाड़खाना....  ​वह कमाता है... और सिर्फ कमाता है, जैसे कोई कोल्हू का बैल अपनी ही परिक्रमा में व्यस्त हो। इस अंधी दौड़ में, उसकी आदिम ललक, उसके सपने, उसकी खुशियाँ पीछे...

खिड़की, पानी, सन्नाटा और अनावश्यक दूरियाँ

सड़न पैदा करती है यह नमी दीवारों पर भी और इस बंद कमरे में भी। खिड़की के काँच पर रेंगती बूँदें कोई कविता नहीं हैं, वे महज़ पानी की लकीरें हैं जो गुरुत्वाकर्षण के नियम से नीचे गिर रही हैं। ​ पर मैं ढूँढ रहा हूँ उसमें— तुम्हारी हँसी का व्याकरण। कितना मूर्खतापूर्ण है इस कड़कती बिजली में तुम्हारी आवाज़ सुनना, और हवा के झोंके के साथ एक ऐसे नाम को फेफड़ों में भर लेना जो इस वक़्त इस शहर के पिनकोड पर मौजूद ही नहीं। ​ यह जो आँखों का गीलापन है, यह कोई 'विरह का उपहार' नहीं; यह सीधे-सीधे एक रासायनिक प्रतिक्रिया है उस खालीपन की, जो तुमने मेरे और इस खिड़की के बीच छोड़ दिया है। ​देह का न मिलना कोई उत्सव नहीं होता, वह एक अंतहीन, तीखी कसक है। पर इस सन्नाटे में, जहाँ तुम नहीं हो, और सिर्फ़ पानी गिर रहा है— मेरा इस तरह टूटकर बिखरना ही शायद मेरे होने की इकलौती साक्ष्य है।

सन्नाटों की चीख

खिड़की से झांकता चाँद कोई रूमानी बिंब नहीं है आज, वह एक जलता हुआ कोयला है जो त्वचा पर पुरानी छापों को कुरेद रहा है। ​ बाहर तापमान शून्य के करीब है, पर भीतर... भीतर एक असमंजस है। यह जिस्म किसी रैंडम छुअन का कबाड़खाना नहीं, इसे सिर्फ वही एक 'स्पर्श' चाहिए जिसने कभी इसे रूह तक सींचा था। ​ नींद लापता है, यादें पुरानी महक की तरह नथुनों में घुस रही हैं। मैं आँखें बंद करता हूँ, तो सन्नाटा और ज़ोर से चीखने लगता है। यह रात गुज़र नहीं रही, यह रात मुझे धीरे-धीरे चबा रही है।

किरदार में तुम हो

चित्र
फिजाओं में, ख़ामोशी में, हर एक इंतज़ार में तुम हो, बदलती धड़कनों में, धुन-ए-ज़िंदग़ी के तार में तुम हो। ​ मेरी रूह के उस कोने में जहाँ बहती है एक मासूमियत, वहाँ मोहब्बत के हर रूप में, और हर पुकार में तुम हो। ​ये सूने रास्ते, ये शाम के साए, ये बहती ठंडी पुरवाई, मैं जहाँ भी पैर बढ़ाता हूँ, सफ़र के उस पार में तुम हो। ​ ज़माने भर के झमेलों से जब थक कर आँखें मूँदूँ मैं, तसल्ली के उस लम्हे में, सकूँ के संसार में तुम हो। ​भले राहें अनजानी हों, या तूफ़ां ज़िन्दगी का गहरा हो, जो डूबने न दे कश्ती को, उस साहिल के प्यार में तुम हो। ​कभी पहाड़ों की ओट से जो उगता है भोर का सूरज, उजाले की उस पहली किरण में, उजले विचार में तुम हो। ​जो रातों को तन्हाई में सुलगता है कोई विरह-गीत, उस दर्द की मीठी कसक में, सुरों के मयार में तुम हो। ​किताबों के पन्नों में लिखे जो इश्क़ के अमर अफ़साने, उन्हीं लफ़्ज़ों की गहराइयों में, सज़दे के इक़रार में तुम हो। ​ कोई पूछे कि 'समीर' का वजूद आख़िर है क्या यहाँ  मैं तो महज़ एक साया हूँ, असल किरदार में तुम हो। ​

कतार से बाहर

भेड़िये नहीं, भेड़ों का रेला है जो बहा जा रहा है और मैं-जानबूझ कर किनारे पर खड़ा उनकी इस सड़ी हुई कतार पर थूक रहा हूँ! कंधे से कंधा छिला, पर आत्माएं अपरिचित थी उस नपुंसक शोर में मैं अपनी खामोशी लेकर निकला- किसी ऐसी धुन पर, जो तुम्हारे कानों के लिए सिर्फ शोर है। मेरा 'कहाँ' और 'क्यों' तुम्हारी समझ की औकात से बाहर है खिल्ली उड़ाओ! क्योंकि तुम्हारी बुद्धि का दायरा रेंगने और जुगाली करने तक ही सीमित है।  उनकी हंसी में बासी सिगरेटों का धुंआ था और मेरी आंखों में एक पूरा शहर जल रहा था वे पूछते हैं - 'रास्ता कहाँ है?' जैसे रास्ता कोई सरकारी बिछा हुआ कालीन हो।  उन्हें नहीं पता कि पैरों के नीचे की जमीन  चलते रहने से बनती है, ठिठक कर नक्शा चाटने से नहीं! उनकी गालियां, उनके ठहाके- मेरे कानों के पास से गुजरते हैं पुरानी मक्खियों की तरह  जो सिर्फ़ गूंज सकती हैं काट नहीं सकती। मैं तुम्हारे तय किये गये सामाजिक व्याकरण की अशुद्धि हूँ  मैं वह अनलिखा शब्द हूँ जिसे तुमने बोलने से परहेज किया - ताकि तुम्हारा सफेदपोश झूठ सुरक्षित रहे। मेरा वह भटकना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है  क्...