पुकारता तुमको
कब से पुकारता तुमको
रेशे रेशे पत्ते पत्ते तुम्हें ढूँढते
हर लम्हे हर दिन तुम्हें ढूँढते
लौट आओ कि बुलाता कोई
भटका हुआ तुमको मिलाता कोई
चकौर सा मन डुलाता तुमको
पागल कब से पुकारता तुमको!
दीप बुझे प्रज्वलित कर दो
भीत भीत की विर्दीर्ण कर दो
अंधेरों को लिए आता कोई
नैराश्य को दिये जाता कोई
पिहू-पिहू सा गान सुनाता तुमको
पागल कब से पुकारता तुमको!
कितने तारे गिने रात भर
कितनी सांसों को साधा है
जो तुम आओगे एक दिन
यह मन तब से आधा है
निरुपाय व्यर्थ ही रुलाता तुमको
पागल कब से पुकारता तुमको!
झूठ कहूं तो मन झूठेगा
सत्य कहूं तो जग रूठेगा
झूठे मन की झूठी आस
टूटे दिल की सूखी प्यास
हर क्षण का हिसाब लगाता तुमको
पागल कब से पुकारता तुमको!
रैन गुजर जाये बाती जले
हर पग आशा लिए चले
किस ओट में तुम छिपे खड़े
किस आहट से द्वार खुलेगा
उस क्षण का गीत सुनाता तुमको
पागल कब से पुकारता तुमको!
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