खार पर लिखी प्रतीक्षा

अवसादों के उन अंतहीन श्रृंखलाओं में उलझ
मैने तुम्हें विवश, अनायास एकाकी खड़ा देखा है
स्मृतियों की परछाइयों से जब मन ऊब गया 
तब विरह की प्रखर धूप में तुम्हें तपते देखा है

कुंतल अस्त-व्यस्त, श्रृंगार सब बिखर गया
नयनों में अधूरी प्यास की करुण भाषा है
हिमखंड सी जम गई है पलकों की ये पोरें
शायद पत्थर हो चुकी कोई पुरानी आशा है

न जाने किस निष्ठुर नियति की आस में,
कहीं द्वार पर तू अपलक पंथ निहारे खड़ तोतो नहीं!

खग कुल के कलरव में, समय की पदचाप सी
घड़ कीकी उस टिक टिक को तुमने अलार्म सुना है
रंगों और सुगंधों के धुंधले स्वप्न लोक में 
तुम्हें मन ही मन कोई गीत गुनगुनाते हुए सुना है

सबकुछ थरथराता हुआ, दृष्टि बुझी बुझी सी
अधरों पर मौन चीखों की एक परिभाषा है
दरकते पर्वतों सी देह पर खिंची ये लकीरें
थक चुकी चेतना की अंतिम अभिलाषा है

न जाने किस महाशून्य की प्रतीक्षा में, 
कहीं खार की ढेरी पर तू अमर ग्रंथ बनी पड़ी तो नहीं! 

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