मधुर मिलन तुम कर देना

सावन के मेघ घिरे
धड़धड़ बरस गये
सूख रही अवनी के 
कण-कण में परस गये

झूले में बैठ गोरियां
सपने नये बुनती सी
पिया मिलन की बूंदें 
सरसर नयनों से टपकी सी

चहुंओर पुष्प खिले
सुरभित सुगंध लिये
गुमसुम रतिभ्रमर को
बयार ने पंख दिये

सांसों में राधा जाग उठी
मन को वृंदावन कर लेना
मरुस्थल बने ह्रदय में 
हरितवन तुम कर देना

पत्तियों में खनकती बूंदों को
धरा में झंकृत कर देना
आहट पाकर मृगनयनी के 
मधुर मिलन तुम कर देना!
©जीवन समीर 

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