संगम का उत्सव

दो प्राणों का जब होता है, पावन शुचि मिलन,
देह की परिधि लांघकर, महकता है अंतर्मन।
यह मात्र वासना का ज्वार नहीं, न केवल तन की प्यास
यह प्रकृति का सृजन गीत है, अटूट विश्वास का वास।

मृदु स्पर्श की सरगम जब, अधरों पर है खिलती,
ह्रदय की धड़कन तब, अनहद नाद से है मिलती।
आलिंगन के पाश में जब, सिमटती है सारी सृष्टि,
तब प्रेम वृष्टि में भीगती, यह काम भाव की दृष्टि।

परिरंभन की ऊष्मा से, प्रदीप्त होता जब रक्त,
प्रेमी युगल हो जाते हैं, एक दूजे में ही सिक्त।
अनुराग के उस क्षण में, जब द्वैत भाव मिट जाता है,
मनुष्य अपनी नश्वरता तज, अमरत्व को पाता है।

यह रति का अनुपम उत्सव, शुचिता का है प्रतीक,
जहाँ समर्पण की भाषा ही, मानी जाती है सटीक।
संसर्ग की उस बेला में, खिलता है आत्मिक बोध,
मिट जाते हैं सब संशय, और शांत होता सब क्रोध।

प्रकृति के इस महायज्ञ में, सृजन की है जो धारा,
उसी प्रेम से रंजित होता, यह संसार सारा।
जहाँ देह बने मंदिर और वासना बने भक्ति,
वही जन्म लेती है, जगत की शाश्वत शक्ति।
©®जीवन समीर 

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