कतार से बाहर
भेड़िये नहीं, भेड़ों का रेला है जो बहा जा रहा है
और मैं-जानबूझ कर किनारे पर खड़ा
उनकी इस सड़ी हुई कतार पर थूक रहा हूँ!
कंधे से कंधा छिला, पर आत्माएं अपरिचित थी
उस नपुंसक शोर में मैं अपनी खामोशी लेकर निकला-
किसी ऐसी धुन पर, जो तुम्हारे कानों के लिए सिर्फ शोर है।
मेरा 'कहाँ' और 'क्यों' तुम्हारी समझ की औकात से बाहर है
खिल्ली उड़ाओ! क्योंकि तुम्हारी बुद्धि का दायरा
रेंगने और जुगाली करने तक ही सीमित है।
उनकी हंसी में बासी सिगरेटों का धुंआ था
और मेरी आंखों में एक पूरा शहर जल रहा था
वे पूछते हैं - 'रास्ता कहाँ है?'
जैसे रास्ता कोई सरकारी बिछा हुआ कालीन हो।
उन्हें नहीं पता कि पैरों के नीचे की जमीन
चलते रहने से बनती है, ठिठक कर नक्शा चाटने से नहीं!
उनकी गालियां, उनके ठहाके-
मेरे कानों के पास से गुजरते हैं पुरानी मक्खियों की तरह
जो सिर्फ़ गूंज सकती हैं काट नहीं सकती।
मैं तुम्हारे तय किये गये सामाजिक व्याकरण की अशुद्धि हूँ
मैं वह अनलिखा शब्द हूँ जिसे तुमने बोलने से परहेज किया -
ताकि तुम्हारा सफेदपोश झूठ सुरक्षित रहे।
मेरा वह भटकना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है
क्योंकि मैं उस मंजिल की तलाश में ही नहीं हूँ
जिसे तुम सफलता का पदक कहते हो ।
तुम्हें तुम्हारी यह सुरक्षित गुलामी मुबारक
मुझे मेरी यह 'अकेली मस्ती' को प्रणाम!
©®जीवन समीर
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