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दम न था

तेरे वादों में दम न था तेरी यादों में दमखम था  वो जो टूटा है आखिरकार  बस वही एक भरम था नसीबों की लकीरों में  तेरा चेहरा ही कम था मेरी आंखों की बस्ती में  सिर्फ यादों का आलम था मोहब्बत की वफाओं में  तेरा हिस्सा ही कम था मेरे हिस्से की रातों में  सहरों का मातम था  जिसे समझा था हकीकत  वो महज एक सितम था तेरे वादों में दम न था  तेरी यादों में दमखम था  जफायें सह के भी समीर  दिल में कोई गम न था तूने जो जख्म दिए दिल पर वो तेरा ही करम था  तेरी वादों में दम न था  तेरी यादों में दमखम था! ©®जीवन समीर 

प्रेम का टेंडर :नीलामी और शर्तें

चलो नीलामी करते हैं प्रेम की तुम्हारे अंतर्मन में विज्ञप्ति छपवाते हैं  देखें कितने ठेकेदारों द्वारा  बोली लगाई जाती है।  पर सुनो, यह बाजार का टेंडर नहीं यहाँ सिक्कों की खनक वर्जित है।  इस नीलामी की निविदा भरने की  कुछ शर्तें बहुत अनिवार्य हैं : 1-पात्रता - वही ठेकेदार यहाँ अर्जी लगा पाएगा  जिसने 'स्व' को खोकर सर्वस्व पाया हो जिसके पास पिछली नाकामियों का अनुभव हो और टूटे दिल की मरम्मत का हुनर आया हो।  2-अमानत राशि- गारंटी के तौर पर सोना चांदी नहीं तुम्हें अपनी रातों की नींद जमा करनी होगी  धडकनों का हिसाब एडवांस देना होगा  और वफा की वसीयत साथ रखनी होगी।  3-तकनीकी बिड- देखा जाएगा कि तुम्हारी रूह कितनी पारदर्शी है क्या तुम आंसुओं को मुस्कराहट में बदल सकते हो? क्या मुश्किलों के उबडखाबड रास्तों पर बिना हाथ छुडाये उम्र भर चल सकते हो? 4-वित्तीय बिड- यहाँ सबसे ऊंची बोली उसकी नहीं होगी  जो महलों के ख्वाब दिखाएगा। टेंडर उसके नाम खुलेगा - जो अपनी पूरी हस्ती, मेरे नाम कर जाएगा । निर्णय की घोषणा - नीलामी का सबसे ज्यादा मूल्य  उसकी खामोशी का...

तुम बिन

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कौन दिशा चली पुरवैया कौन दिशा चले सांवरिया दलदल में धंसा उर मेरा कौन दिशा जाये बावरिया पनघट पर चिढाये सखियां दुस्तर हो गई व्यथा डगरिया तीर नजरों के दुखते मदने बोझिल हुई विरह गठरिया अब के आकर बरस जाओ प्रीति में मानसून जैसे भीग भीग जाऊं इस तरह जनम जनम रहूं बस ऐसे ये चूड़ियाँ कंगना झुमके नकबेसर ये केश पलकें मंद मंद मुस्कान लूट लो तुम चैन धडकन सांसें तेरे बिन मैं कुछ नहीं मेरे साजन भंवर में पतवार डुबोती जा रही न कोई शिकायत न झांसा कोई रिश्तों के अनुबंध में बंधी हूं क्यो सोचो एकबार तुम बिन प्यासा कोई नयनों में कामुकता झलके बयार ने फिर मादकता छलकाई देह का सिंगार करूं भी कैसे तुम बिन कहां जीवन में मधुराई। ~जीवन समीर 

बह गये आंसू

बह गये आंसू के साथ सब गिले शिकवे हट गये गलतफहमियों के सब मलबे आंखों की दश्त में हुई बरसात इस कदर ढह गये ख्वाबों के सब महले दुमहले ठहरी थी निगाहें उनको ऊंचाइयों में देखने की चाटने लगे सब उनकी तबाही के तलवे सूखे पत्तों सा दिल मेरा मसला गया हर बार कहर ढा गये एक-एक कर उनके सब फतवे बिगड़े मौसम सा रहा तेरा मिजाज जीवन दिखा गये मुंतजिरी तेरे सब बेअदब जलवे ~जीवन समीर