पथ
हम जो सजे-धजे घूमते हैं तर्क के चमकीले परिधान पहने वस्तुतः हम बौद्धिक भिखारी हैं। हमारी मेधा- किसी और के छोड़े हुए जूठन पर पलती है। हमारे शब्द, उन मरे हुए मुहावरों की राख है जिन्हें समय की आंधी कभी का उड़ा चुकी होती। यह जो हम सोचते हैं कि हम सोच रहे हैं क्या वह वास्तव में सोचना है? या कि मस्तिष्क की परतों में रिकार्ड की गई किसी पुरानी प्रतिध्वनि का दोहराव मात्र? हमारी विवशता शारीरिक नहीं सूक्ष्म है परतंत्रता अब बेड़ियों में नहीं हमारे सहज बोध की हत्या है। हमने अपने भीतर एक अदृश्य सेंसर बिठा लिया है जो किसी भी मौलिक अंकुर के फूटने से पूर्व उसे लोक-ल याया सिद्धांत की कैंची से कतर देता है। कितनी गहरी है यह दरिद्रता - कि हम अपने ही मन के एकांत में नग्न होने से डरते हैं! हमारा स्व एक ऐसा घर है जिसकी चाबियां पड़ोसियों के पास हैं। निसंदेह रोचकता कहीं खो गई है। क्योंकि रोचकता साहस की संतान है- अज्ञात में छलांग लगाने का साहस बिना किसी पूर्वाग्रह के जीवन के नग्न सत्य को आंख भर देखने का साहस। यदि हम तैयार हो जाएं- सिर्फ़ एक पल...