सन्नाटों की चीख
खिड़की से झांकता चाँद कोई रूमानी बिंब नहीं है आज, वह एक जलता हुआ कोयला है जो त्वचा पर पुरानी छापों को कुरेद रहा है। बाहर तापमान शून्य के करीब है, पर भीतर... भीतर एक असमंजस है। यह जिस्म किसी रैंडम छुअन का कबाड़खाना नहीं, इसे सिर्फ वही एक 'स्पर्श' चाहिए जिसने कभी इसे रूह तक सींचा था। नींद लापता है, यादें पुरानी महक की तरह नथुनों में घुस रही हैं। मैं आँखें बंद करता हूँ, तो सन्नाटा और ज़ोर से चीखने लगता है। यह रात गुज़र नहीं रही, यह रात मुझे धीरे-धीरे चबा रही है।