किरदार में तुम हो


फिजाओं में, ख़ामोशी में, हर एक इंतज़ार में तुम हो,
बदलती धड़कनों में, धुन-ए-ज़िंदग़ी के तार में तुम हो।
मेरी रूह के उस कोने में जहाँ बहती है एक मासूमियत,
वहाँ मोहब्बत के हर रूप में, और हर पुकार में तुम हो।

​ये सूने रास्ते, ये शाम के साए, ये बहती ठंडी पुरवाई,
मैं जहाँ भी पैर बढ़ाता हूँ, सफ़र के उस पार में तुम हो।
ज़माने भर के झमेलों से जब थक कर आँखें मूँदूँ मैं,
तसल्ली के उस लम्हे में, सकूँ के संसार में तुम हो।

​भले राहें अनजानी हों, या तूफ़ां ज़िन्दगी का गहरा हो,
जो डूबने न दे कश्ती को, उस साहिल के प्यार में तुम हो।

​कभी पहाड़ों की ओट से जो उगता है भोर का सूरज,
उजाले की उस पहली किरण में, उजले विचार में तुम हो।

​जो रातों को तन्हाई में सुलगता है कोई विरह-गीत,
उस दर्द की मीठी कसक में, सुरों के मयार में तुम हो।

​किताबों के पन्नों में लिखे जो इश्क़ के अमर अफ़साने,
उन्हीं लफ़्ज़ों की गहराइयों में, सज़दे के इक़रार में तुम हो।
कोई पूछे कि 'समीर' का वजूद आख़िर है क्या यहाँ 
मैं तो महज़ एक साया हूँ, असल किरदार में तुम हो।

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