संदेश

#Hindi_Poem लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

न्यूनोक्ति

न्यूनोक्ति ​ तुम बिल में दुबके रहे और सर्प तुम्हें भांपता रहा; मैं हाथ पर हाथ धरे वक्त का मूक गवाह बना रहा। ​ तभी बादलों का एक आवारा झुंड आया मुझसे बतियाने, और आँख झपकते ही ओझल हो गया एक कोरा अविश्वास छोड़कर। यह हवा भी तो एक बेपरवाह तंत्र है, जिसकी कोई अपनी दिशा नहीं। ​ तुम्हारा आना महज एक संयोग हो सकता है, मगर तुम्हारे पीछे खड़ी परछाईं— मेरी रीढ़ में सिहरन पैदा करती है, वह मुझे कतई नहीं सुहाती। ​ गणित की इस निष्ठुर कक्षा में तुम्हारे सारे तर्क मोम की तरह पिघल रहे थे; मैंने संख्याओं को 'नौ दो ग्यारह' होते यहाँ पहली बार देखा। ​ अंततः,  सत्य को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया; और असत्य को ओढ़कर इतराने वाले— खुद को 'अतरंगी' समझ बैठे थे।