बिखंडित पुरुष का कोलाज

वह लौटता है
थका-हारा नहीं, बल्कि किस्तों में मरा हुआ।
दरवाजे पर दस्तक देते ही
वह चेहरे पर टांग लेता है—'सब ठीक है' का एक पेशेवर मुखौटा,
क्योंकि दुनिया को एक मुकम्मल रीढ़ की हड्डी चाहिए,
मनुष्य नहीं।
वह जोड़ता है, समेटता है, सहेजता है
स्त्री, बच्चे, बूढ़े मां-बाप और खोखले रिश्ते...
वह घर की छत थामे खड़ा एक खंभा है,
जिसकी दरारों को देखने की फुर्सत
दीवारों को भी नहीं है।
मौन का चीरफाड़... 
​भीतर एक सन्नाटा है—खौलता हुआ,
पर वह अपनी घुटन को 'कुंठा' के डिब्बे में बंद रखता है।
गुस्सा, उदासी, और अपराधबोध का एक ऐसा कॉकटेल,
जिसे वह हर रोज पीता है और मुस्कुराता है।

क्योंकि 'पुरुष' का रोना,
उसकी सामाजिक वल्दियत पर एक सवालिया निशान है।
​स्त्री साथ देती है, पर वह भी उस कगार तक नहीं पहुंच पाती
जहाँ पुरुष का सामर्थ्य, बेबसी बनकर घुटने टेक देता है।
यह सह-अस्तित्व है या दो समानांतर दुखों का मौन समझौता?
उम्र का कबाड़खाना.... 
​वह कमाता है... और सिर्फ कमाता है,
जैसे कोई कोल्हू का बैल अपनी ही परिक्रमा में व्यस्त हो।
इस अंधी दौड़ में,
उसकी आदिम ललक, उसके सपने, उसकी खुशियाँ
पीछे छूट जाते हैं—किसी लावारिस लाश की तरह।
​वह बूढ़ा हो जाता है,
उसकी देह एक कबाड़खाना बन जाती है,
जहाँ दबी हुई भावनाओं के पुर्जे जंग खा रहे हैं।

उसे कोई मोक्ष नहीं चाहिए,
उसे ईश्वर का घर भी नहीं चाहिए,
उसे तो बस इस ब्रह्मांड में एक 'कोना' चाहिए था...
जहाँ वह अपनी मर्दानगी का बोझ उतारकर
एक बार, सिर्फ एक बार, बेआबरू होकर रो सकता!
​अंतिम छूटा हुआ पृष्ठ
​इसी असमंजस, इसी घुटन की अंतहीन रील
एक दिन अचानक टूट जाती है।

वह विदा लेता है दुनिया से,
पीछे छोड़ जाता है एक खाली कमरा, कुछ कर्ज़ और भारी सन्नाटा।
​चिता की राख में सब जल जाता है,
पर जो नहीं जलता—
वह है कुछ अनकही प्रतीक्षायें,
और एक थके हुए पुरुष की वह अधूरी चीख,

जिसके लिए
इस व्यवस्था के पास, इस समाज के पास,
कान नहीं होते।

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