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बिखंडित पुरुष का कोलाज

वह लौटता है थका-हारा नहीं, बल्कि किस्तों में मरा हुआ। दरवाजे पर दस्तक देते ही वह चेहरे पर टांग लेता है—'सब ठीक है' का एक पेशेवर मुखौटा, क्योंकि दुनिया को एक मुकम्मल रीढ़ की हड्डी चाहिए, मनुष्य नहीं। ​ वह जोड़ता है, समेटता है, सहेजता है स्त्री, बच्चे, बूढ़े मां-बाप और खोखले रिश्ते... वह घर की छत थामे खड़ा एक खंभा है, जिसकी दरारों को देखने की फुर्सत दीवारों को भी नहीं है। ​ मौन का चीरफाड़...  ​भीतर एक सन्नाटा है—खौलता हुआ, पर वह अपनी घुटन को 'कुंठा' के डिब्बे में बंद रखता है। गुस्सा, उदासी, और अपराधबोध का एक ऐसा कॉकटेल, जिसे वह हर रोज पीता है और मुस्कुराता है। क्योंकि 'पुरुष' का रोना, उसकी सामाजिक वल्दियत पर एक सवालिया निशान है। ​स्त्री साथ देती है, पर वह भी उस कगार तक नहीं पहुंच पाती जहाँ पुरुष का सामर्थ्य, बेबसी बनकर घुटने टेक देता है। यह सह-अस्तित्व है या दो समानांतर दुखों का मौन समझौता? ​ उम्र का कबाड़खाना....  ​वह कमाता है... और सिर्फ कमाता है, जैसे कोई कोल्हू का बैल अपनी ही परिक्रमा में व्यस्त हो। इस अंधी दौड़ में, उसकी आदिम ललक, उसके सपने, उसकी खुशियाँ पीछे...

न्यूनोक्ति

न्यूनोक्ति ​ तुम बिल में दुबके रहे और सर्प तुम्हें भांपता रहा; मैं हाथ पर हाथ धरे वक्त का मूक गवाह बना रहा। ​ तभी बादलों का एक आवारा झुंड आया मुझसे बतियाने, और आँख झपकते ही ओझल हो गया एक कोरा अविश्वास छोड़कर। यह हवा भी तो एक बेपरवाह तंत्र है, जिसकी कोई अपनी दिशा नहीं। ​ तुम्हारा आना महज एक संयोग हो सकता है, मगर तुम्हारे पीछे खड़ी परछाईं— मेरी रीढ़ में सिहरन पैदा करती है, वह मुझे कतई नहीं सुहाती। ​ गणित की इस निष्ठुर कक्षा में तुम्हारे सारे तर्क मोम की तरह पिघल रहे थे; मैंने संख्याओं को 'नौ दो ग्यारह' होते यहाँ पहली बार देखा। ​ अंततः,  सत्य को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया; और असत्य को ओढ़कर इतराने वाले— खुद को 'अतरंगी' समझ बैठे थे।