सावन

तप्त वसुधा के हृदय पर, मेघ का नूतन प्रणय है,
नभ विहँसता तड़ित-हास से, चपला का यह विक्षय है।
झर रहे नभ से प्रपात, सिक्त तृण-तृण हो रहा है,
धुल गया जग का कलुष, जन-मन उमंगित सो रहा है।

घिर आए घन गगन में, छा गई श्यामल घटाएँ,
मत्त चातक गा रहा, झूमती पुरवैया हवाएँ।
मृत्तिका की गंध में, डूबा हृदय का हर कोना,
सृष्टि के इस रंग में, अब व्यर्थ है व्याकुल रोना।

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