सावन और प्यास
कहाँ नहीं भटका मैं तुम बिन, यमुना के इन तट पर,
जैसे राधा भटक रही हो, सूने-सूने पनघट पर।
कदम्ब की वह डार अब, उलाहना सी देती है,
हर एक बहती लहर, मेरा धीरज छीन लेती है।
सावन की यह झड़ी, जैसे गोपी की अविरल धार,
जैसे बिन घनश्याम के, उजड़ा हो सारा संसार।
नभ में घिरते काले बादल, कान्हा की याद दिलाते हैं,
पर उनमें वह श्याम नहीं, बस वज्र ही गिर जाते हैं।
मौन हुई वह मुरली अब, जो अधरों पर सजती थी,
जिसकी तान पर सारी सृष्टि, प्रेम-रंग में बजती थी।
अब तो केवल विरह की वह, पंचम तान सुनाई दे,
जहाँ भी देखूँ, शून्य ही बस, चारों ओर दिखाई दे।
जैसे राधा तड़प रही थी, कुंज-गलिन में व्याकुल हो,
जैसे मधुबन का हर पंछी, डोल रहा था आकुल हो।
वैसे ही मैं तुम बिन प्रिय! विरह-ताप में जलता हूँ,
अपने ही मन की चिता पर, प्रतिपल मैं ही गलता हूँ।
चाँद बना है अब चकोर का, बिछड़ा हुआ सा एक सपन,
तारे जैसे बिखरे हों, ब्रज के धूलि-धूसरित आँगन।
लौट आओ कि अब सावन की, यह बरखा सहनी भारी है,
तुम बिन मेरी जीत भी प्रिय! अब तो एक बड़ी हारी है।
तुम ही मेरे श्याम हो, तुम ही मेरी राधा की प्यास,
तुम्हीं से है मेरा अंत, और तुम्हीं से मेरा विश्वास।
लौट आओ कि फिर से गूँजे, इस हृदय में मल्हार,
तुम बिन सूना पड़ा हुआ है, मेरा यह सारा संसार।
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