रूपसि....!
रूपसि!
देह से परे
नेह से मिले
हेय हो कि
श्रद्धेय हो
तुम हो अद्भुत
अद्वितीय हो
ज्ञेय हो कि
अज्ञेय हो
तुम रूपसि
शून्य का संगीत हो
या मौन की हुंकार हो,
सृष्टि के इस कोलाहल में
एक शाश्वत विचार हो।
मूर्त हो कि
अमूर्त हो
तुम भाव का ही रूप हो,
शरद की जो मन को भाए
तुम वही तो धूप हो।
लौकिक हो कि
अलौकिक हो
तुम चेतना का मर्म हो,
हर तर्क से जो परे रहे
तुम वो सनातन धर्म हो।
देह की सीमाओं से मुक्त,
तुम नेह का ही पर्याय हो,
जिसे पाकर हृदय ठहर जाए
तुम वो अंतिम अध्याय हो।
तुम रूपसि...
...अनंत का विस्मय हो।
तुम रूपसि
काल की परिधि से मुक्त
एक ठहरा हुआ क्षण हो,
चंचल जगत के चक्रव्यूह में
अचल, निश्छल मन हो।
प्रश्न हो कि
उत्तर हो
तुम आदि-अंत का भेद हो,
ऋचाओं में जो अनकहा रहा
तुम वो पांचवां वेद हो।
क्षणिक हो कि
शाश्वत हो
तुम सत्य का आभास हो,
हृदय की सूनी गुफा में
एक अलक्षित प्रकाश हो।
साकार हो कि
निराकार हो
तुम शून्य का विस्तार हो,
इस पार जो समझ न आया
तुम उस पार का संसार हो।
बंधती नहीं जो शब्दों में,
तुम उस अनुभूति का सार हो,
सृष्टि जिसे नित खोज रही
तुम वो असीम विस्तार हो।
तुम रूपसि...
...तुम ब्रह्म का ही पर्याय हो।
तुम रूपसि
माया का आवरण हो
या ब्रह्म का ही प्रकाश हो?
भ्रम की घनी इस रात में
तुम बोध का आकाश हो।
द्रष्टा हो कि
दृश्य हो
तुम आदिम एक अभिलाषा हो,
जो व्याकरण में समाए नहीं
तुम वो मौन भाषा हो।
अंश हो कि
पूर्ण हो
तुम घट में बहता नीर हो,
इस पार की सब व्याकुलता
उस पार की तुम पीर हो।
द्वैत हो कि
अद्वैत हो
तुम एकांत का संगीत हो,
जिसे खुद में खोकर पा लिया
तुम वही अनादि मीत हो।
तुम रूपसि...
...तुम स्वयं का ही साक्षात्कार हो।
तुम रूपसि
प्रकृति का आदि विलास हो
या पुरुष का मौन संवेग हो?
सृष्टि के इस महाकाव्य का
तुम पहला और अंतिम वेग हो।
सांख्य हो कि
वेदांत हो
तुम सब वादों का अंत हो,
बंधे नहीं जो संप्रदायों में
तुम वो सहज, सनातन संत हो।
चेतना हो कि
जड़ता हो
तुम त्रिगुणमयी आधार हो,
(सत्व, रज, तम की हलचल में)
तुम ठहराव का सार हो।
माया का कौतुक हो कि
चिन्मय की शुचि आभा हो,
हर तर्क जहाँ थक कर हारे
तुम उस बोध की परिभाषा हो।
अनहद का नाद हो कि
अनाहत की गूँज हो,
इस घट के भीतर जलती हुई
तुम एक अखंड पुंज हो।
तुम रूपसि...
...तुम नेति-नेति का विस्तार हो।
तुम रूपसि
प्रकृति का आदि विलास हो
या पुरुष का मौन संवेग हो?
सृष्टि के इस महारंग में
तुम ही तो आदिम आवेग हो।
सांख्य हो कि
वेदांत हो
तुम हर विमर्श का अंत हो,
शून्यता के इस महामंच पर
तुम सहज, सनातन संत हो।
जड़ हो कि
चेतन हो
तुम त्रिगुणातीत आधार हो,
माया के इस कोलाहल में
तुम ही कैवल्य का सार हो।
भास हो कि
आभास हो
तुम चिन्मय की ही कांति हो,
विक्षोभों की इस दुनिया में
तुम परम, आत्यंतिक शांति हो।
अनहद हो कि
अनाहत हो
तुम मौन का ही विस्तार हो,
नेति-नेति के इस महामार्ग का
तुम अंतिम साक्षात्कार हो।
तुम रूपसि...
...तुम स्वयं का ही विस्तार हो।
रुपसि
देह से परे
नेह से मिले
हेय हो कि
श्रद्धेय हो
तुम हो अद्भुत
अद्वितीय हो
ज्ञेय हो कि
अज्ञेय हो
तुम रूपसि
शून्य का संगीत हो
या मौन की हुंकार हो,
सृष्टि के इस कोलाहल में
एक शाश्वत विचार हो।
मूर्त हो कि
अमूर्त हो
तुम भाव का ही रूप हो,
शरद की जो मन को भाए
तुम वही तो धूप हो।
लौकिक हो कि
अलौकिक हो
तुम चेतना का मर्म हो,
हर तर्क से जो परे रहे
तुम वो सनातन धर्म हो।
तुम रूपसि
काल की परिधि से मुक्त
एक ठहरा हुआ क्षण हो,
चंचल जगत के चक्रव्यूह में
अचल, निश्छल मन हो।
प्रश्न हो कि
उत्तर हो
तुम आदि-अंत का भेद हो,
ऋचाओं में जो अनकहा रहा
तुम वो पांचवां वेद हो।
तुम रूपसि
प्रकृति का आदि विलास हो
या पुरुष का मौन संवेग हो?
सृष्टि के इस महारंग में
तुम ही तो आदिम आवेग हो।
सांख्य हो कि
वेदांत हो
तुम हर विमर्श का अंत हो,
शून्यता के इस महामंच पर
तुम सहज, सनातन संत हो।
जड़ हो कि
चेतन हो
तुम त्रिगुणातीत आधार हो,
माया के इस कोलाहल में
तुम ही कैवल्य का सार हो।
भास हो कि
आभास हो
तुम चिन्मय की ही कांति हो,
विक्षोभों की इस दुनिया में
तुम परम, आत्यंतिक शांति हो।
अनहद हो कि
अनाहत हो
तुम मौन का ही विस्तार हो,
नेति-नेति के इस महामार्ग का
तुम अंतिम साक्षात्कार हो।
तुम रूपसि...
...तुम स्वयं का ही विस्तार हो।
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