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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पथ

हम जो सजे-धजे घूमते हैं तर्क के चमकीले परिधान पहने  वस्तुतः हम बौद्धिक भिखारी हैं। हमारी मेधा- किसी और के छोड़े हुए जूठन पर पलती है। हमारे शब्द, उन मरे हुए मुहावरों की राख है जिन्हें समय की आंधी कभी का उड़ा चुकी होती।  यह जो हम सोचते हैं कि हम सोच रहे हैं  क्या वह वास्तव में सोचना है? या कि मस्तिष्क की परतों में रिकार्ड की गई  किसी पुरानी प्रतिध्वनि का दोहराव मात्र? हमारी विवशता शारीरिक नहीं सूक्ष्म है परतंत्रता अब बेड़ियों में नहीं  हमारे सहज बोध की हत्या है।  हमने अपने भीतर एक अदृश्य सेंसर बिठा लिया है  जो किसी भी मौलिक अंकुर के फूटने से पूर्व  उसे लोक-ल याया सिद्धांत की कैंची से कतर देता है।  कितनी गहरी है यह दरिद्रता - कि हम अपने ही मन के एकांत में  नग्न होने से डरते हैं! हमारा स्व एक ऐसा घर है जिसकी चाबियां पड़ोसियों के पास हैं। निसंदेह रोचकता कहीं खो गई है।  क्योंकि रोचकता साहस की संतान है- अज्ञात में छलांग लगाने का साहस बिना किसी पूर्वाग्रह के जीवन के नग्न सत्य को आंख भर देखने का साहस।  यदि हम तैयार हो जाएं- सिर्फ़ एक पल...

कतार से बाहर

भेड़िये नहीं, भेड़ों का रेला है जो बहा जा रहा है और मैं-जानबूझ कर किनारे पर खड़ा उनकी इस सड़ी हुई कतार पर थूक रहा हूँ! कंधे से कंधा छिला, पर आत्माएं अपरिचित थी उस नपुंसक शोर में मैं अपनी खामोशी लेकर निकला- किसी ऐसी धुन पर, जो तुम्हारे कानों के लिए सिर्फ शोर है। मेरा 'कहाँ' और 'क्यों' तुम्हारी समझ की औकात से बाहर है खिल्ली उड़ाओ! क्योंकि तुम्हारी बुद्धि का दायरा रेंगने और जुगाली करने तक ही सीमित है।  उनकी हंसी में बासी सिगरेटों का धुंआ था और मेरी आंखों में एक पूरा शहर जल रहा था वे पूछते हैं - 'रास्ता कहाँ है?' जैसे रास्ता कोई सरकारी बिछा हुआ कालीन हो।  उन्हें नहीं पता कि पैरों के नीचे की जमीन  चलते रहने से बनती है, ठिठक कर नक्शा चाटने से नहीं! उनकी गालियां, उनके ठहाके- मेरे कानों के पास से गुजरते हैं पुरानी मक्खियों की तरह  जो सिर्फ़ गूंज सकती हैं काट नहीं सकती। मैं तुम्हारे तय किये गये सामाजिक व्याकरण की अशुद्धि हूँ  मैं वह अनलिखा शब्द हूँ जिसे तुमने बोलने से परहेज किया - ताकि तुम्हारा सफेदपोश झूठ सुरक्षित रहे। मेरा वह भटकना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है  क्...

पुकारता तुमको

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कब से पुकारता तुमको रेशे रेशे पत्ते पत्ते तुम्हें ढूँढते  हर लम्हे हर दिन तुम्हें ढूँढते  लौट आओ कि बुलाता कोई  भटका हुआ तुमको मिलाता कोई  चकौर सा मन डुलाता तुमको  पागल कब से पुकारता तुमको! दीप बुझे प्रज्वलित कर दो  भीत भीत की विर्दीर्ण कर दो  अंधेरों को लिए आता कोई  नैराश्य को दिये जाता कोई  पिहू-पिहू सा गान सुनाता तुमको  पागल कब से पुकारता तुमको! कितने तारे गिने रात भर कितनी सांसों को साधा है जो तुम आओगे एक दिन  यह मन तब से आधा है निरुपाय व्यर्थ ही रुलाता तुमको  पागल कब से पुकारता तुमको! झूठ कहूं तो मन झूठेगा  सत्य कहूं तो जग रूठेगा झूठे मन की झूठी आस टूटे दिल की सूखी प्यास हर क्षण का हिसाब लगाता तुमको  पागल कब से पुकारता तुमको!  रैन गुजर जाये बाती जले हर पग आशा लिए चले किस ओट में तुम छिपे खड़े  किस आहट से द्वार खुलेगा  उस क्षण का गीत सुनाता तुमको  पागल कब से पुकारता तुमको!  ©®जीवन समीर 

प्रेम-मंजरी

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मृगमद सी श्वासें तेरी, दृगन् मादकता छाय। रतिकेलि के स्वप्न उपजे, छवि निरखत बल खाय।।1 अधर गुलाबी पांखुरी, मुसकन मोहक रूप। तन कांचन सा दमकता, सदृश खिली हो धूप।।2 अधरों की मदिरा पिये, तन मन बेसुध होय।  बाहुपाश में बांध कर, पीड़ा विस्मरित होय।। 3 थरथर कांपे देह यहि, परस भयो जब मीत। अंग-अग में ज्वाला जली, भूली दुनिया रीत।।4 कंचन कुंचन तानि आये, सुदृढ़ भये भुज पाश। स्वेद-कणों से खिल उठी, तन की मधु मधु वास।।5 अधरन सो अधर मिले, बढ़ी हिये की रार। डूबे रस के सिंधू में, मिट गई सब तकरार। ।6 सेज सजी कामनन की, दीपक भयो मलीन। रतिक्रीडा में खो गये, प्रेमी दोऊं लीन।।7 मिटी प्यास सब जनम की, शांत भई अब देह। जैसे पावन नीर में, घुलमिल गया सनेह।।8 बिखरी अलकें सेज पर, अधर हुए खामोश । मौन कह रहा प्रेम की, गाथा पाकर होश।।9 दो तन थे पर एक हुए, मिटा गयी सब द्वैत। प्रेम शिखर पर हम मिले, हो गये अब अद्वैत ।।10 ©®जीवन समीर 

संगम का उत्सव

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दो प्राणों का जब होता है, पावन शुचि मिलन, देह की परिधि लांघकर, महकता है अंतर्मन। यह मात्र वासना का ज्वार नहीं, न केवल तन की प्यास यह प्रकृति का सृजन गीत है, अटूट विश्वास का वास। मृदु स्पर्श की सरगम जब, अधरों पर है खिलती, ह्रदय की धड़कन तब, अनहद नाद से है मिलती। आलिंगन के पाश में जब, सिमटती है सारी सृष्टि, तब प्रेम वृष्टि में भीगती, यह काम भाव की दृष्टि। परिरंभन की ऊष्मा से, प्रदीप्त होता जब रक्त, प्रेमी युगल हो जाते हैं, एक दूजे में ही सिक्त। अनुराग के उस क्षण में, जब द्वैत भाव मिट जाता है, मनुष्य अपनी नश्वरता तज, अमरत्व को पाता है। यह रति का अनुपम उत्सव, शुचिता का है प्रतीक, जहाँ समर्पण की भाषा ही, मानी जाती है सटीक। संसर्ग की उस बेला में, खिलता है आत्मिक बोध, मिट जाते हैं सब संशय, और शांत होता सब क्रोध। प्रकृति के इस महायज्ञ में, सृजन की है जो धारा, उसी प्रेम से रंजित होता, यह संसार सारा। जहाँ देह बने मंदिर और वासना बने भक्ति, वही जन्म लेती है, जगत की शाश्वत शक्ति। ©®जीवन समीर